Thursday , 19 January 2017
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Ghazal

अब और नहीं : ग़ज़ल

ghazal

Her spirit craves to come out of the shell and strives for the sky of her share! My Ghazal portrays the plight of a woman in search of her true self and identity. पथरीली  ज़मीं पे राहतें अब और नहीं, तपिश में जले पाँव, मंज़िल का कहीं ठौर नहीं. धूप में जलके मैंने, छाँव की क्या करली ख़्वाहिश, रेत में जली मग़र नख़लिस्तां में कहीं ठौर नहीं. दो ग़ज़ ज़मीं की थी तलाश, उन रहनुमाओं में, वहां तलक पहुँच हुई ... Read More »

कविता कहूँ या ग़ज़ल

kavita

For me, Hindi poetry (kavita) is a way of expressing my soft yet strong emotions. But similar feelings when conveyed through a ghazal, turn more romantic, beautiful and compact. Here’s how I tried to emote in both the ways. कविता मैंने धीमे से कुछ कहा सरसराती पत्तियों से, मेरे शब्द थे अपर्याप्त … चीखें नहीं, बस शब्द थे कुछ क्षीण… मधुर , कुछ उन्नींदे से, क्षण- भंगुर पर नींदें उड़ गयीं कई जब हवाओं ने सुना, और उड़ा ले गयीं ... Read More »

एक शिकायत: Ghazal

The Style Symphony

हर सितम हम सह गए, पर सिसकियों की भी इजाज़त ना मिली, अश्कों का दरिया मिला, दामन भिगोने की नज़ाकत ना मिली | आज हर चेहरा यहाँ ओढ़े हुए, मासूमियत का है नक़ाब, यह शरीफों का जहाँ, पर देखने को भी शराफ़त न मिली | कोई नाउम्मीदगी भी दे ना पाई थी इतना ग़म हमें, एक ही ग़म है हमें कि, आपकी नज़रे-इनायत ना मिली | आपका ख़त क्या मिला, शिकवों की वो लम्बी सी फ़ेहरिस्त थी, लाख़ हम ढूँढा ... Read More »

तमाम रात : Ghazal

तमाम रात

It’s bliss for an insomniac like me, to experience the dawn first, before the whole world does. But as all good things come with a price, I pay it with those sleepless nights draped with melancholy; yet the opportunist me craves fame out of that. Here, the bewildered insomniac expresses her gloom through this Ghazal. ~ Ghazal ~                                             ... Read More »

गुमराह: Ghazal

I have written this Hindi poem after a long gap. When the pain is inevitable, my feelings get intense and expressions commemorate in a way, that’s obviously Hindi poetry. कुछ शोख़ रंग बदरंग हुए, कुछ सुर्ख़ ख़्वाब भी ख़ाक हुए, रचकर जोड़े जो रिश्ते ख़ास, हर आह तले वो राख हुए |  अपने बनकर गैरों ने, तोड़े हर आशियाने, अपनेपन की खाल ओढ़, जो आये घर बनाने | रातें तो रौशन  न हुईं, चटकीले दिन भी स्याह हुए. मंज़िल,… ढूंढें न मिली, हम ... Read More »

फ़ना के बाद: Ghazal

tss hindi poetry

अश्के-सागर में डूबने से ज़रा शोर तो होगा, मेरी इस ख़ुदकुशी पे रोया कोई और तो होगा | रास्ते सुनसान हैं, मेरी मंज़िल भी दूर है, सांस लेने को बियाबां में कहीं ठौर तो होगा | दुश्मनी ही सही, कोई तो रिश्ता हो कम से कम, दुश्मन हुआ तो क्या, किया गौर तो होगा | मेरा हर एक आंसू है मेरी ख़ामोशी की जुबां, लफ़्ज़ों नहीं पर अश्कों में वो ज़ोर तो होगा | एक ख्वाहिश थी लिख सकूँ, अपनी ख्वाहिशों ... Read More »

हसरतें: Ghazal

tss hindi poetry

कम से कम हमसे किसी को कुछ गिला तो है, शुक्र है कि आज कोई ग़ुल खिला तो है | माना कि इस तरफ नहीं था रुख़ हवाओं का, एक ही सही, कोई पत्ता हिला तो है | हमसफ़र नहीं तो क्या, तकदीर है मेरी, बेवफ़ा भी संग, दो कदम चला तो है | लाख खुद सितम किया, पर आपका ये दिल दूसरे सितमगरों से कुछ जला तो है | क्या पता था, आपकी चाहत है बेबसी, ये नया राज़ आज ... Read More »

मंज़िलें: Ghazal

tss hindi poetry

वक़्त ने करवट बदली और आईने बदल गए, चेहरे के शिकन बदले, ज़िन्दगी के पैमाने बदल गए | कुछ इस तरह से हम लिखते रहे रात भर की सुबह हुई और लफ़्ज़ों के मायने बदल गए | मीलों चले हम अपनी हसरतों के संग-संग, हम देखते ही रह गए और वो सामने बदल गए | स्याही से लिखे हर्फ़, ज़िन्दगी के गीत थे, सुर भी सजे थे, फिर भी  अफ़साने  बदल गए | बेघर हमे किया और हुए वो बेखबर, ... Read More »

ख़्वाहिशें: Ghazal

tss hindi poetry

कहने को बहुत कुछ है, पर आग़ाज़ ना मिला पंख हैं अब भी मगर, परवाज़ ना मिला | बिखरे हुए सरगम मैं सजाती रही उम्र भर सुर तो हैं सजे हुए, पर साज़ ना मिला | हज़ार ख़्वाहिशें सिरहाने रख, सोयी थी कल रात, बस ज़माने को दिखाने का अंदाज़ ना मिला | बेतरतीब सुर सजा लिए मैंने करीने से पर आवाज़ से जो मिला दे आवाज़, ना मिला | शुक्रिया किया तेरा ऐ देने वाले ख़ुदा आँखों से ही ... Read More »