godrej expert

I Didn’t listen To You Maa

[caption id="attachment_7120" align="aligncenter" width="605"] PC: cdn.shutterstock.com[/caption] I gazed into her seasoned eyes, She said, “A quick glance should suffice. But never-ever do this to anyone, Co’z your quietude isn’t meant to be gone. All you are deemed to behold down, So that you can ignore all frowns.” But I didn’t...Read More
radha krishna painting

यात्रा (Yatra)

[caption id="attachment_4318" align="aligncenter" width="648"] 'Radha Krishna' by Maitreni Mishra[/caption] मेरी यात्रा अविरल, हर पल मैं चली छोड़ ऐश्वर्य, महल मुड़कर देखा बस एक बार कुछ टूटा था, जो छूटा था मैं आहत थी और शब्दहीन, तुम मुखर बड़े और प्रखर खड़े | कुछ कहा-अनकहा बाकी था मैं कह न सकी,...Read More
अमूल्य

अमूल्य

[dropcap]S[/dropcap]ometimes she's being called a deity or sometimes being compared to priceless substances. But, a woman is always considered as an 'object of desire' and is expected to sacrifice for the sake of her family and society. She has to pay the price to be called '[highlight]priceless[/highlight]'. This poem portrays...Read More
क्यों

द्वय (Dualism)

[dropcap]B[/dropcap]ible says, this mankind is the result of the mistakes made by Eve in the Garden of Eden. When Eve tasted the forbidden fruit, she got tempted and provoked Adam to commit sin, resulting in her punishment of suffering from labour pain. Bible specifies carnal relationships as prohibited sins and...Read More
धुरी और परिपथ

धुरी और परिपथ

पृथ्वी का घूमना अपनी धुरी पर या फिर एक निश्चित परिपथ में परिक्रमा सूर्य की, — विज्ञान के इस सत्य को जीने की नियति है मेरी भी निरंतर.... अपनी अस्मिता की तलाश में आत्मकेन्द्रित होकर स्वयं की धुरी पर घूमना और कर्तव्यों की आकाशगंगा में नियति द्वारा तय एक अज्ञात,...Read More
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मेरे हिस्से का दर्द

  पीड़ा झेलती मेरी अनुभूतियाँ और झेलते हैं दर्द मेरे शब्द भी, तब जाकर कहीं रचित होती है मेरी व्यथा की कविता | घुमड़ते मेघों - आषाढ़ बनकर ही रहो सावन बनकर मत बरसो इन आँखों से, रुपहले तारों से कह दो मत झाकेँ असमय इन श्याम सुनहरी अलकों से...Read More
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सृजन का सच

हर सुबह जब झरता है पत्तों से अँधेरा हवा चुनती है बूँदें ओस की और, गूंजता है हवाओं में राग भैरव धूप की पहली, कुंवारी किरण भेदना चाहती है वातावरण में फैली वासना की गहरी धुंध; चाहती  हूँ मैं भी, बिखेर दूँ हर ओर ताज़ी सुगंध | पर, स्याह किरणों...Read More
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हौसलों की हार…

हौसलों के पंख लगाकर उड़ने की बातें करते थे हम कल तक, आतंक के अट्टहास तले, रेंगते, सरकते उन्ही हौसलों को देखा है अभी| रक्तरंजित सड़कों के बीच जीने की जद्दोज़हद में खिसकते, घिसटते उन्ही हौसलों को देखा है अभी| शवों के ढेर जिनपर होती नित नई राजनीति चिताओं पर...Read More