Wednesday , 29 March 2017
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यात्रा (Yatra)

radha krishna painting

मेरी यात्रा अविरल, हर पल मैं चली छोड़ ऐश्वर्य, महल मुड़कर देखा बस एक बार कुछ टूटा था, जो छूटा था मैं आहत थी और शब्दहीन, तुम मुखर बड़े और प्रखर खड़े | कुछ कहा-अनकहा बाकी था मैं कह न सकी, तुम सुन न सके मैं कर न सकी कुछ अभिव्यक्त तुम सुन न सके कुछ अतिरिक्त बस स्वयं मेरा और अहम् तुम्हारा रह न सके सान्निध्य में | कभी मीलों तक थे तुम आगे और मैं सदियों तक दौड़ पड़ी ... Read More »

अमूल्य

अमूल्य

Sometimes she’s being called a deity or sometimes being compared to priceless substances. But, a woman is always considered as an ‘object of desire’ and is expected to sacrifice for the sake of her family and society. She has to pay the price to be called ‘priceless’. This poem portrays the complexities and paradoxes of a woman’s life. आँखों की चकाचौंध, वैभव का प्रतीक, स्वर्ण | शायद अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग नियति झेलने को विवश | एक दक्ष जौहरी के ... Read More »

द्वय (Dualism)

क्यों

Bible says, this mankind is the result of the mistakes made by Eve in the Garden of Eden. When Eve tasted the forbidden fruit, she got tempted and provoked Adam to commit sin, resulting in her punishment of suffering from labour pain. Bible specifies carnal relationships as prohibited sins and states them the weakness of humans. Even in Hindu mythology Lord Shiva is portrayed as Ardhanarishwar (half man and half woman), the most powerful deity of this universe. This poem is ... Read More »

धुरी और परिपथ

धुरी और परिपथ

पृथ्वी का घूमना अपनी धुरी पर या फिर एक निश्चित परिपथ में परिक्रमा सूर्य की, — विज्ञान के इस सत्य को जीने की नियति है मेरी भी निरंतर…. अपनी अस्मिता की तलाश में आत्मकेन्द्रित होकर स्वयं की धुरी पर घूमना और कर्तव्यों की आकाशगंगा में नियति द्वारा तय एक अज्ञात, अबूझ परिपथ पर एक नियोजित सूर्य की यंत्रवत परिक्रमा सूर्य के प्रचंड और उद्विग्न ताप में झुलसने की विवशता तथा धुरी और परिपथ की दोहरी दौड़ में अपने आंसुओं तक ... Read More »

मेरे हिस्से का दर्द

tss hindi poetry

  पीड़ा झेलती मेरी अनुभूतियाँ और झेलते हैं दर्द मेरे शब्द भी, तब जाकर कहीं रचित होती है मेरी व्यथा की कविता | घुमड़ते मेघों – आषाढ़ बनकर ही रहो सावन बनकर मत बरसो इन आँखों से, रुपहले तारों से कह दो मत झाकेँ असमय इन श्याम सुनहरी अलकों से | क्यों शोषण करती हैं पंच-इन्द्रियाँ सारी ऊर्जा रहने दो बस एक स्पंदन मात्र मेरे मन के लिए भी | मेरे अंतर्मन पर पड़े निशान, इतना मत टीसो की सारे आँसु ... Read More »

सृजन का सच

tss hindi poetry

हर सुबह जब झरता है पत्तों से अँधेरा हवा चुनती है बूँदें ओस की और, गूंजता है हवाओं में राग भैरव धूप की पहली, कुंवारी किरण भेदना चाहती है वातावरण में फैली वासना की गहरी धुंध; चाहती  हूँ मैं भी, बिखेर दूँ हर ओर ताज़ी सुगंध | पर, स्याह किरणों से कैसे लिखूँ सुनहरे छंद, कैसे कहूँ, किससे कहूँ, कि कविता हरी कोंपलों से फूटती है सड़े पत्तों के ढेर से नहीं, मंन जो बंधा है कोमल सुरों से “रॉक-रैप” ... Read More »

हौसलों की हार…

tss hindi poetry

हौसलों के पंख लगाकर उड़ने की बातें करते थे हम कल तक, आतंक के अट्टहास तले, रेंगते, सरकते उन्ही हौसलों को देखा है अभी| रक्तरंजित सड़कों के बीच जीने की जद्दोज़हद में खिसकते, घिसटते उन्ही हौसलों को देखा है अभी| शवों के ढेर जिनपर होती नित नई राजनीति चिताओं पर सिंकती राजनीतिज्ञों की रोटी शहीदों की चिताओं तले सिसकते, सुबकते उन्ही हौसलों को देखा है अभी| थर्राते हाथों से शवों के ढेर में ढूंढते अपने अपनों को भयाक्रांत चेहरों की ... Read More »