Thursday , 25 May 2017
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Tag Archives: intense emotions

अमूल्य

अमूल्य

Sometimes she’s being called a deity or sometimes being compared to priceless substances. But, a woman is always considered as an ‘object of desire’ and is expected to sacrifice for the sake of her family and society. She has to pay the price to be called ‘priceless’. This poem portrays the complexities and paradoxes of a woman’s life. आँखों की चकाचौंध, वैभव का प्रतीक, स्वर्ण | शायद अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग नियति झेलने को विवश | एक दक्ष जौहरी के ... Read More »

द्वय (Dualism)

क्यों

Bible says, this mankind is the result of the mistakes made by Eve in the Garden of Eden. When Eve tasted the forbidden fruit, she got tempted and provoked Adam to commit sin, resulting in her punishment of suffering from labour pain. Bible specifies carnal relationships as prohibited sins and states them the weakness of humans. Even in Hindu mythology Lord Shiva is portrayed as Ardhanarishwar (half man and half woman), the most powerful deity of this universe. This poem is ... Read More »

अनुभूति और अभिव्यक्ति

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कल्पनाओं के पाँखी उड़ गए, संभावनाओं के पंख पसार| बंजर मन की परती में, अंकुरने से, भावनाओं ने किया इन्कार| यथार्थ की दुपहरी, बिखेर गयी, धूप, कर्कश जेठ सी| वर्जनाओं में जकड़ी मैं, बह न सकी, मुठ्ठी में बंद रेत सी| अनुभूति, कोई नागफनी का पौधा नहीं और कांटे हैं नहीं अभिव्यक्तियाँ| अब कहो तुम ही की मेरी कल्पना, कैसे हो साकार ? — संगीता मिश्रा Read More »

तुम और मैं

तुम और मैं

I don’t worship and I’m being called an atheist, but I share a special bond with God which makes me see Him through the eyes of a friend than those of a follower. My special connection with the Almighty gets stronger despite all criticism of not being a believer. This poem portrays my special connect with Him. तुम ! निखिल विश्व, प्रकृति विस्तार अनादि, अनंत, सच्चिदानंद ! मैं? तुम्हारी तुलना में मेरा अस्तित्व ही क्या? तुम तो हो ज्ञान के ... Read More »

रात की स्याही

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बोझिल शामें, ऊंघती रातें……………., आहत आँखों की साज़िश से हर साँस बिखरती है, कतरा-कतरा होकर मेरी आवाज़ बहकती है, रात मुझसे ही होकर हर रात गुज़रती है, फ़िर भी मेरी आँखों में नहीं नींद बसती है |  कानों को बींधता है जब सन्नाटे का शोर, जिस ओर मुझे बुलाता, मैं चल देती उस ओर, सूरज जब अंगड़ाइयाँ लेकर उठता हर अगली भोर, तब जाकर कहीं मेरी आँखों में एक रात पसरती है, फ़िर भी मेरी आँखों में नहीं नींद बसती है ... Read More »

सृजन का सच

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हर सुबह जब झरता है पत्तों से अँधेरा हवा चुनती है बूँदें ओस की और, गूंजता है हवाओं में राग भैरव धूप की पहली, कुंवारी किरण भेदना चाहती है वातावरण में फैली वासना की गहरी धुंध; चाहती  हूँ मैं भी, बिखेर दूँ हर ओर ताज़ी सुगंध | पर, स्याह किरणों से कैसे लिखूँ सुनहरे छंद, कैसे कहूँ, किससे कहूँ, कि कविता हरी कोंपलों से फूटती है सड़े पत्तों के ढेर से नहीं, मंन जो बंधा है कोमल सुरों से “रॉक-रैप” ... Read More »

फ़ना के बाद: Ghazal

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अश्के-सागर में डूबने से ज़रा शोर तो होगा, मेरी इस ख़ुदकुशी पे रोया कोई और तो होगा | रास्ते सुनसान हैं, मेरी मंज़िल भी दूर है, सांस लेने को बियाबां में कहीं ठौर तो होगा | दुश्मनी ही सही, कोई तो रिश्ता हो कम से कम, दुश्मन हुआ तो क्या, किया गौर तो होगा | मेरा हर एक आंसू है मेरी ख़ामोशी की जुबां, लफ़्ज़ों नहीं पर अश्कों में वो ज़ोर तो होगा | एक ख्वाहिश थी लिख सकूँ, अपनी ख्वाहिशों ... Read More »

हसरतें: Ghazal

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कम से कम हमसे किसी को कुछ गिला तो है, शुक्र है कि आज कोई ग़ुल खिला तो है | माना कि इस तरफ नहीं था रुख़ हवाओं का, एक ही सही, कोई पत्ता हिला तो है | हमसफ़र नहीं तो क्या, तकदीर है मेरी, बेवफ़ा भी संग, दो कदम चला तो है | लाख खुद सितम किया, पर आपका ये दिल दूसरे सितमगरों से कुछ जला तो है | क्या पता था, आपकी चाहत है बेबसी, ये नया राज़ आज ... Read More »

मंज़िलें: Ghazal

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वक़्त ने करवट बदली और आईने बदल गए, चेहरे के शिकन बदले, ज़िन्दगी के पैमाने बदल गए | कुछ इस तरह से हम लिखते रहे रात भर की सुबह हुई और लफ़्ज़ों के मायने बदल गए | मीलों चले हम अपनी हसरतों के संग-संग, हम देखते ही रह गए और वो सामने बदल गए | स्याही से लिखे हर्फ़, ज़िन्दगी के गीत थे, सुर भी सजे थे, फिर भी  अफ़साने  बदल गए | बेघर हमे किया और हुए वो बेखबर, ... Read More »

ख़्वाहिशें: Ghazal

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कहने को बहुत कुछ है, पर आग़ाज़ ना मिला पंख हैं अब भी मगर, परवाज़ ना मिला | बिखरे हुए सरगम मैं सजाती रही उम्र भर सुर तो हैं सजे हुए, पर साज़ ना मिला | हज़ार ख़्वाहिशें सिरहाने रख, सोयी थी कल रात, बस ज़माने को दिखाने का अंदाज़ ना मिला | बेतरतीब सुर सजा लिए मैंने करीने से पर आवाज़ से जो मिला दे आवाज़, ना मिला | शुक्रिया किया तेरा ऐ देने वाले ख़ुदा आँखों से ही ... Read More »

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