ऐ ज़िन्दगी !

a woman looking at sky o life, ऐ ज़िन्दगी अजनबी !


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ऐ ज़िन्दगी is another addition to my #NewLife series of poems, I’ve been writing since July 2017. I’ve written several Haiku, Ghazals, English Poems, Hindi Poems (both in rhyme-n-rhythm and verse libre) in this series of verses. Like other poems of this sequence, this free verse Hindi poem, too, portrays the nil desperandum spirit, which invigorates one to celebrate life to its fullest, in spite of all odds.

ऐ अजनबी !
आँख में आँख डाल
टकटकी बांधे जो देखा तुझे
ऐ ज़िन्दगी,
अजनबी सी क्यों लगे तू मुझे?

मुट्ठी में बंद रेत सी
जो फिसलकर गुज़र गयी,
बांधनी चुनरी के
कच्चे रंग सी जो उतर गयी,
बीत गयी रात के चौथे पहर सी,
लगती क्यों सन्नाटे के बाद
आये कहर सी ?

ज़िन्दगी,
क्यों मुझे तू अपनी सी न लगे?
क्यों मेरी रातों को
चिलचिलाती दुपहर सी तू ठगे ?

ऐ अजनबी, ऐ ज़िन्दगी!
दिखला दे कुछ नए तेवर
कि अब तुझसे लड़ना है,
बन जा मेरे नए ज़ेवर
कि अब तुझ संग सजना है !
हो जा अवांछित से मनोवांछित
कि अब और नहीं सहना है !

आँख से आँख मिला
कल जब देखा तुझे
औंधे मुँह क्यों गिर पड़ी
ऐ ज़िन्दगी?
फिर धूल- धूसरित राहों से
सर उठा,
क्या करेगी मुझसे साक्षात्कार?
रातें हों गहरी,
या सुबह सुनहरी
क्या फिर होंगे पल निर्विकार ?

ओस की बूंदों सी बिखरती
पत्तियों के बीच मुँह छिपाती,
ऐ ज़िन्दगी !
कह दे मुझसे
नहीं तू एक अजनबी !

 

  • Jyotirmoy Sarkar

    Very insightful, deeper look to life presented very nicely.
    Coining of words is fantastic and a nice poem as usual.

  • वाह बहुत खूब रचनात्मक भावनात्मक अभिव्यक्ति